झाबुआ में होली की अनोखी परंपरा- 'गल देवता':आदिवासी समाज के लोग मांगते हैं मन्नत, पूरी होने करते हैं अनुष्ठान

झाबुआ जिले के ग्रामीण अंचलों में होली के अवसर पर आस्था का एक अनूठा रूप देखने को मिलता है। यहां परिवार पर आए संकट या सुख-समृद्धि की कामना पूरी होने पर श्रद्धालु 'गल देवता' की मन्नत उतारते हैं। इसी परंपरा के तहत, इस वर्ष धुलेंडी के पावन अवसर पर नवापाड़ा निवासी भेरूलाल निनामा, धन्ना निनामा और नाथु निनामा गल देवता के चक्र पर झूलकर अपनी मन्नत पूरी करेंगे। मन्नतधारी भेरूलाल निनामा ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार की खुशहाली और सुख-शांति के लिए पांच वर्ष पहले यह कठिन संकल्प लिया था। उनकी मनोकामना पहले ही वर्ष में पूर्ण हो गई थी, लेकिन श्रद्धावश वे लगातार पांच वर्षों तक इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। इस बार उनका यह तीसरा वर्ष है जब वे गल में घूमेंगे। यह मन्नत जितनी फलदायी मानी जाती है, इसका पालन करना उतना ही कठिन है। मन्नतधारी होली से सात दिन पूर्व ही अपने शरीर पर हल्दी का लेप करते हैं। वे लाल वस्त्र धारण कर माथे पर पगड़ी बांधते हैं। उनके हाथों में नारियल और कांच-कंघा होता है, और आंखों में काजल लगा होता है। इन सात दिनों तक श्रद्धालु कड़े नियमों का पालन करते हैं, जिसमें ब्रह्मचर्य का पालन और घर के बाहर खुले में सोना अनिवार्य होता है। भोजन को लेकर भी कठोर नियम हैं; ये श्रद्धालु स्वयं अपने हाथों से भोजन तैयार करते हैं और पूरे दिन में केवल एक ही बार भोजन (एकसना) ग्रहण करते हैं। इन सात दिनों में मन्नतधारी नंगे पैर रहकर झाबुआ जिले के प्रमुख भगोरिया हाट बाजारों जैसे मेघनगर, थांदला, पेटलावद और रायपुरिया के आसपास के क्षेत्रों में जाते हैं और लोगों से मेल-मिलाप करते हैं। भेरूलाल का कहना है कि जहां अटूट श्रद्धा होती है, वहां ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहती है। उनके अनुसार गल देवता ही उनके पूरे परिवार की रक्षा करते हैं। झाबुआ अंचल में प्रचलित इस परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में जनसैलाब उमड़ता है।

झाबुआ जिले के ग्रामीण अंचलों में होली के अवसर पर आस्था का एक अनूठा रूप देखने को मिलता है। यहां परिवार पर आए संकट या सुख-समृद्धि की कामना पूरी होने पर श्रद्धालु 'गल देवता' की मन्नत उतारते हैं। इसी परंपरा के तहत, इस वर्ष धुलेंडी के पावन अवसर पर नवापाड़ा निवासी भेरूलाल निनामा, धन्ना निनामा और नाथु निनामा गल देवता के चक्र पर झूलकर अपनी मन्नत पूरी करेंगे। मन्नतधारी भेरूलाल निनामा ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार की खुशहाली और सुख-शांति के लिए पांच वर्ष पहले यह कठिन संकल्प लिया था। उनकी मनोकामना पहले ही वर्ष में पूर्ण हो गई थी, लेकिन श्रद्धावश वे लगातार पांच वर्षों तक इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। इस बार उनका यह तीसरा वर्ष है जब वे गल में घूमेंगे। यह मन्नत जितनी फलदायी मानी जाती है, इसका पालन करना उतना ही कठिन है। मन्नतधारी होली से सात दिन पूर्व ही अपने शरीर पर हल्दी का लेप करते हैं। वे लाल वस्त्र धारण कर माथे पर पगड़ी बांधते हैं। उनके हाथों में नारियल और कांच-कंघा होता है, और आंखों में काजल लगा होता है। इन सात दिनों तक श्रद्धालु कड़े नियमों का पालन करते हैं, जिसमें ब्रह्मचर्य का पालन और घर के बाहर खुले में सोना अनिवार्य होता है। भोजन को लेकर भी कठोर नियम हैं; ये श्रद्धालु स्वयं अपने हाथों से भोजन तैयार करते हैं और पूरे दिन में केवल एक ही बार भोजन (एकसना) ग्रहण करते हैं। इन सात दिनों में मन्नतधारी नंगे पैर रहकर झाबुआ जिले के प्रमुख भगोरिया हाट बाजारों जैसे मेघनगर, थांदला, पेटलावद और रायपुरिया के आसपास के क्षेत्रों में जाते हैं और लोगों से मेल-मिलाप करते हैं। भेरूलाल का कहना है कि जहां अटूट श्रद्धा होती है, वहां ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहती है। उनके अनुसार गल देवता ही उनके पूरे परिवार की रक्षा करते हैं। झाबुआ अंचल में प्रचलित इस परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में जनसैलाब उमड़ता है।